धर्म
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धर्म का अर्थ होता है, धारण, अर्थात जिसे धारण किया जा सके, धर्म ,कर्म प्रधान है। गुणों को जो प्रदर्शित करे वह धर्म है। धर्म को गुण भी कह सकते हैं। धर्म और सम्प्रदाय में मूलभूत अंतर है। धर्म का अर्थ जब गुण और जीवन में धारण करने योग्य होता है तो वह प्रत्येक मानव के लिए समान होना चाहिए। जब धर्म सार्वभौमिक है तो मानव जाति के लिए भी तो इसकी सार्वभौमिकता होनी चाहिए। अतः मानव के सन्दर्भ में धर्म की बात करें तो वह केवल मानव धर्म है।
यहाँ उल्लेखनीय है कि धर्म शब्द में गुण का अर्थ केवल मानव से संबंधित नहीं है। प्राणी/पदार्थ के लिए भी धर्म शब्द प्रयुक्त होता है, यथा पानी का धर्म है बहना, अग्नि का धर्म है प्रकाश, उष्मा देना और संपर्क में आने वाली वस्तु को जलाना। व्यापकता के दृष्टिकोण से धर्म को गुण कहना सजीव, निर्जीव दोनों के अर्थ में नितांत ही उपयुक्त है। धर्म सार्वभौमिक होता है। प्राणी हो या पदार्थ पूरी पृथ्वी के किसी भी कोने में बैठे प्राणी या पदार्थ का धर्म एक ही होता है। उसके देश, रंग रूप की कोई बाधा नहीं है। धर्म सार्वकालिक होता है यानी कि प्रत्येक काल में युग में धर्म का स्वरूप वही रहता है। धर्म कभी बदलता नहीं है। उदाहरण के लिए पानी, अग्नि आदि पदार्थ का धर्म सृष्टि निर्माण से आज पर्यन्त समान है।
वैदिक काल में "धर्म" शब्द एक प्रमुख विचार प्रतीत नहीं होता है। यह ऋग्वेद के 1,000 भजनों में एक सौ गुना से भी कम दिखाई देता है जो कि 3,000 साल से अधिक पुराना है।[1] 2,300 साल पहले सम्राट अशोक ने अपने कार्यकाल में इस शब्द का इस्तेमाल करने के बाद, "धर्म" शब्द प्रमुखता प्राप्त की थी। पांच सौ वर्षों के बाद, ग्रंथों का समूह सामूहिक रूप से धर्म-शास्त्रों के रूप में जाना जाता था, जहां धर्म सामाजिक दायित्वों के साथ समान था, जो व्यवसाय (वर्णा धर्म), जीवन स्तर (आश्रम धर्म), व्यक्तित्व (सेवा धर्म) पर आधारित थे। , राजात्व (राज धर्म), स्री धर्म और मोक्ष धर्म।
हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, जैन या बौद्ध आदि धर्म न होकर सम्प्रदाय या समुदाय मात्र हैं। “सम्प्रदाय” एक परम्परा के मानने वालों का समूह है। ऐसा माना जाता है कि धर्म इंसान को अच्छाई के मार्ग पर लेकर जाता है।
( पालि : धम्म ) भारतीय संस्कृति और दर्शन की प्रमुख संकल्पना है। 'धर्म' शब्द का पश्चिमी भाषाओं में कोई समतुल्य शब्द का पाना बहुत कठिन है। साधारण शब्दों में धर्म के बहुत से अर्थ हैं जिनमें से कुछ ये हैं- कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचरण, सद्-गुण आदि।
सभी संप्रदायों में प्रकाश तक पहुचने के भिन्न स्थिति है । पूर्वी संंप्रदायों में देवता महात्मा के सर के पीछे है प्रकाश वलय है == हिन्दू त्रिदेव के सर के पीछे प्रकाश वलय । जैन में तीर्थंकर के पीछे प्रकाश वलय । बौध्द में बुध्द में। सिख में गुरूनानक में। झेन में चांद के रूप में। शिन्तो में सूर्य देवी कामी है । ताओ कन्यफूजियस में भी महात्माओ के पीछे है ।
जबकी पश्चात् संंप्रदायों में भिन्न है । यहूदी में आग का दिया या फिर तारा है । क्रिश्चियन में पवित्र आत्मा के रूप में और मरीयम यशु गाॅड फादर के सर के पीछे है । मुस्लिम में ईद का चांद और तारा है । पारसी में आग के दिया या फिर महात्मा के सर के पीछे है ।
अर्थात जो प्रकाश की कल्पना होती है ध्यान में वही मनुष्य को स्वयं के चेतना अनुसार परमात्मा या महात्मा दिखाई देते है । यही प्रकाश ही परम् सत्य आधार है इसे वेदों में ब्रह्म कहा गया है जिसको जाने की कोशिश में माया वश वहां परमात्मा नजर आता है।
विज्ञान के सिध्दान्त का बिंग बैंग का शुरूवाती प्रकाश बिन्दु है जिसे विश्व की उत्पत्ति हुई है ।
ह्रदय के भीतर ही प्राचीन धर्म सभ्यता व साम्राज्य के दुनिया के घटनाऐ होते है ।
धर्मो की उत्पत्ति =
पूर्वी धर्म
हिन्दू संप्रदाय ब्रह्म जिसके स्वरूप ब्रह्मा विष्णु और महेश है उनकी उत्पत्ति के बाद सतयुग त्रेतायुग द्वापर युग व कलयुग समय है । लगभग 50 लाख वर्ष पहले ।
जैन संप्रदाय ऋषभनाथ के विचारधारा से हुई तीर्थंकर जो ब्राम्हा के मानस पुत्र के वंशज और राम के पूर्वज है ये भी 50 लाख वर्ष पूर्व।
बौद्ध संप्रदाय बुद्ध के विचारधारा चार हजार वर्ष पूर्व ।
झेन संप्रदाय बोधीधर्मा के विचारधारा तीन चार हजार वर्ष पूर्व
सिख संप्रदाय गुरूनानक के विचारधारा आठ सौ वर्ष पूर्व ।
हिन्दू संप्रदाय के ही जन्में महात्मा ऋषभनाथ बुद्ध बोधिधर्मा व गुरूनानक है ।
ताओ संप्रदाय लाओत्सू के विचारधारा तीन हजार वर्ष पूर्व। शिन्तो संप्रदाय कोई समय नहीं है और ये पीढी दार पीढ़ी विचारधारा है । कन्फ्यूशी संप्रदाय कन्यफूशियस के विचारधारा है चार हजार वर्ष पूर्व।
विज्ञान के सिध्दान्त वैज्ञानिकों के सिध्दान्त है जो भौतिक तत्वों का विश्लेषण पर आधारित है ।
पश्चिमी संप्रदाय ==== इन संप्रदायों की स्थापना किसी दूसरे के मान्यता का विरोध कर स्थापित किया गया है स्वयं के विचार को ।
यहूदी संप्रदाय मूसा ने मिस्र के फेरूओ के विचारों का विरोध कर एक नया संप्रदाय बनाया पांच छैः हजार वर्ष पूर्व। क्रिश्चियन संप्रदाय यशु ने शायद रोमन विचारधारा का विरोध किया और नया बनाया ढाई हजार वर्ष पहले । मुस्लिम संप्रदाय मोहम्मद ने कई संस्कृति के विचारधारा का विरोध कर नया संप्रदाय लगभग चौदह सौ वर्ष पहले । पारसी संप्रदाय के जरथुष्ट्री ने भी किसी सभ्यता का विरोध कर बनाया था । अगर ध्यान दिया जाऐ तो पश्चिमी संप्रदाय में पहले प्राचीन सभ्यताएं रहती थी जिसकी मान्यता कुछ और ही थी वे धर्म नहीं थे जैसे मिस्र रोमन बेबीलोन सुमेरू इन्ही में कही सिन्धुघाटी सभ्यता भी है इन सबका अस्तित्व खत्म हुआ तो यहूदी इसाई मुस्लिम और पारसी संप्रदाय आये । और ये संप्रदाय जा फैले वहां माया सभ्यता इंका सभ्यता आदि का अंत हो गया ।
पूर्वी संप्रदाय के बाद साम्राज्य आए विक्रमादित्य मौर्य चंगेज खान चोला चीन व मंगोल आदि के साम्राज्य है ।
इन साम्राज्य नीति के कारण विश्व का आज वर्तमान का इतिहास है ।
हिन्दू समुदाय
सनातन धर्म में चार पुरुषार्थ स्वीकार किए गये हैं जिनमें धर्म प्रमुख है। तीन अन्य पुरुषार्थ ये हैं- अर्थ, काम और मोक्ष।
गौतम ऋषि कहते हैं - 'यतो अभ्युदयनिश्रेयस सिद्धिः स धर्म।' (जिस काम के करने से अभ्युदय और निश्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है। )
मनु ने मानव धर्म के दस लक्षण बताये हैं:
- धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
- धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥
- (धृति (धैर्य), क्षमा (दूसरों के द्वारा किये गये अपराध को माफ कर देना, क्षमाशील होना), दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (अन्तरंग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना) ; ये दस मानव धर्म के लक्षण हैं।)
जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ नहीं करना चाहिये - यह धर्म की कसौटी है।
- श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम्।
- आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत् ॥
- (धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो ! अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये।)
उपरोक्त मानव धर्म का पालन करने वाला हिन्दू समुदाय विश्व के सभी बड़े समुदायों में सबसे पुराना है। यह समुदाय पहले आर्य (श्रेष्ठ) नाम से संबोधित किया जाता था। इस समुदाय की कई मान्यताएँ वेदों पर आधारित है, यह समुदाय अपने अन्दर कई अलग अलग उपासना पद्धतियाँ, मत, सम्प्रदाय को मानने वालों को समेटे हुए हैं। ये दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा समुदाय है, पर इसके ज़्यादातर लोग भारत में हैं और विश्व का सबसे अधिक हिन्दुओं का प्रतिशत नेपाल में है। हालाँकि इस समुदाय के लोगों द्वारा कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन असल में ये एकेश्वरवादी धर्म है।
इस समुदाय के लोग स्वयं को सनातन धर्म अथवा वैदिक धर्म मानने वाला कहते हैं। इंडोनेशिया में इस धर्म का औपचारिक नाम "हिन्दु आगम" है। हिन्दू केवल एक सम्प्रदाय ही नहीं है अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है। लोगों का मानना है कि "हिन्सायाम दूयते या सा हिन्दू" अर्थात जो अपने मन वचन कर्म से हिंसा से दूर रहे वह हिन्दू है।
के अनुसार धर्म=== वात्स्यायन ने धर्म और अधर्म की तुलना करके धर्म को स्पष्ट किया है। वात्स्यायन मानते हैं कि मानव के लिए धर्म मनसा, वाचा, कर्मणा होता है। यह केवल क्रिया या कर्मों से सम्बन्धित नहीं है बल्कि धर्म चिन्तन और वाणी से भी संबंधित है।[2]
- का अधर्म' : हिंसा, अस्तेय, प्रतिसिद्ध मैथुन
- शरीर का धर्म : दान, paritrabanan, परिचरण (दूसरों की सेवा करना)
- बोले और लिखे गये शब्दों द्वारा अधर्म : मिथ्या, परुष, सूचना, असम्बन्ध
- बोले और लिखे गये शब्दों द्वारा धर्म : सत्व, हितवचन, प्रियवचन, स्वाध्याय (self study)
- मन का अधर्म : परद्रोह, परद्रव्याभिप्सा (दूसरे का द्रव्य पा लेने की इच्छ), नास्तिक्य (denial of the existence of morals and religiosity)
- मन का धर्म : दया, स्पृहा (disinterestedness), और श्रद्धा
महाभारत
महाभारत के वनपर्व (३१३/१२८) में कहा है-
- धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
- तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
- मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी न करना, इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले।
- दूसरे शब्दों में, जो पुरूष धर्म का नाश करता है, उसी का नाश धर्म कर देता है। और जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी धर्म भी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले, इस भय से धर्म का हनन अर्थात् त्याग कभी न करना चाहिए
जैन समुदाय

जैन ग्रंथ, तत्त्वार्थ सूत्र में १० धर्मों का वर्णन है। यह १० धर्म है:[3]
- उत्तम क्षमा
- उत्तम मार्दव
- उत्तम आर्जव
- उत्तम शौच
- उत्तम सत्य
- उत्तम संयम
- उत्तम तप
- उत्तम त्याग
- उत्तम आकिंचन्य
- उत्तम ब्रह्मचर्य
इन्हें भी देखें
सन्दर्भ
- "How did the 'Ramayana' and 'Mahabharata' come to be (and what has 'dharma' got to do with it)?".
- Klaus Klostermaier, A survey of Hinduism,, SUNY Press, ISBN 0-88706-807-3, Chapter 3: Hindu dharma
- जैन २०११, पृ॰ १२८.
सन्दर्भ सूची
- जैन, विजय कुमार (२०११), आचार्य उमास्वामी तत्तवार्थसूत्र, Vikalp Printers, आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-903639-2-1
बाहरी कड़ियाँ
- उपकार यू.जी.सी. नेट/जे.आर.एफ./सेट समाजशास्त्र - लेखकः प्रो बनवारी लाल प्रजापति - पृष्ठ 151